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पंडित पलायन के 26 वर्ष व भाजपा पीडीपी गठबंधन

Posted On: 20 Jan, 2016 Others में

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पंडित पलायन के 26 वर्ष व भाजपा पीडीपी गठबंधन
कश्मीरी पंडितों के पलायन के 26 वर्ष पूर्ण हो जानें पर स्वाभाविक ही है कि आज कश्मीरी पुनर्वास की चर्चा हो अपितु वहां चल रहे भाजपा-पीडीपी गठबंधन की प्रतीक्षित सरकार के लक्ष्य की भी चिंता हो. यद्दपि पिछले विस चुनाव में भाजपा श्रीनगर में सत्तारूढ़ होनें में विफल रही तथापि वह रिकार्ड संख्या में विधानसभा में विराजी. तब भाजपा द्वारा पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनानें व उसके दीर्घकालीन कश्मीरी संकल्पों के मध्य बहुत से वैचारिक मतभेद व कार्यकर्ताओं का असंतोष स्वाभावतः ही मुखर हुआ था, किन्तु तब भी भाजपा ने एक दुस्साहसी किन्तु पवित्र संकल्प के साथ मुफ़्ती मोहम्मद के नेतृत्व में सरकार बना ली थी. सरकार बनानें के दस दिन बाद ही भाजपा को झटका लगा जब मुफ़्ती ने भाजपा की सहमति के बिना मसरत जैसे देशद्रोही की रिहाई करा दी व आगे और भी देशद्रोहियों की रिहाई की बात करनें लगे. ऐसा ही वैचारिक प्रतिरोध कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के संदर्भों में भी जारी रहा है.
आज कश्मीर में 19 जन.1990 को हुए जनसंहार के बाद 26 वर्षों का दीर्घ समय  बीत गया है जिसमें दिल्ली और श्रीनगर की असंवेदनशीलता के सिवा कश्मीरी पंडितों को कुछ नहीं मिला है. कश्मीर में स्वतंत्रता के समय में 15% कश्मीरी पंडितों की आबादी थी जो आज 1 % से नीचें होकर 0 % की ओर बढ़ गई है. कश्मीर के ज.स. आंकड़ों में यदि परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक खोजें तो वह एक भयावह दिन -19 जन. 1990 के नाम से जाना जाता है. 1989 से ही पाकिस्तान प्रेरित और प्रायोजित आतंकवादी और अलगाववादी यहाँ अपनी जड़ें बैठाकर पंडितों को घाटी से भगाने का लक्ष्य बना चुके थे. भारत सरकार आतंकवाद की समाप्ति में लगी हुई थी तब के दौर में वहां रह रहे ये देशभक्त कश्मीरी पंडित भारत सरकार के मित्र और इन आतंकियों और अलगाववादियों के दुशमन और खबरी सिद्ध हो रहे थे. इस दौर में कश्मीर में अलगाववादी समाज और आतंकवादियों ने इस शांतिप्रिय हिन्दू पंडित समाज के विरुद्ध चल रहे अपनें धीमें और छदम संघर्ष को घोषित संघर्ष में बदल दिया. इस भयानक नरसंहार पर फारुक अब्दुल्ला की रहस्यमयी चुप्पी और कश्मीरी पंडित विरोधी मानसिकता केवल इस घटना के समय ही सामनें नहीं आई थी. तब के दौर में फारुख अब्दुल्ला अपनें पिता शेख अब्दुल्ला के क़दमों पर चलते हुए अपना कश्मीरी पंडित विरोधी आचरण कई बार सार्वजनिक कर चुके थे. हिजबुल मुजाहिदीन नें 4 जन. 1990 को कश्मीर के स्थानीय समाचार पत्र में एक एक विज्ञप्ति प्रकाशित कराई जिसमें स्पष्टतः सभी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने की धमकी दी गई थी. उधर पाक  प्रधानमन्त्री बेनजीर नें भी कश्मीरियों को भारत से मुक्ति पानें का एक भड़काऊ भाषण दे दिया. घाटी की मस्जिदों में अजान के स्थान पर हिन्दुओं के लिए धमकियां और हिन्दुओं को खदेड़ने या मार-काट देनें के जहरीले आव्हान और भारत विरोधी नारे बजने लगे. एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र अल-सफा ने भी इस विज्ञप्ति का प्रकाशन किया था. इस भड़काऊ, नफरत, धमकी, हिंसा और भय से भरे शब्दों और आशय वाली विज्ञप्ति के प्रकाशन के बाद कश्मीरी पंडितों में गहरें तक भय, डर घबराहट का संचार हो गया. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तब तक कश्मीरी पंडितों के विरोध में कई छोटी बड़ी घटनाएं वहां सतत घट ही रही थी और कश्मीरी प्रशासन और भारत सरकार दोनों ही उन पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे थे. 19जन. 1990 की भीषणता को और कश्मीर और भारत सरकार की विफलता को इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि पूरी घाटी में कश्मीरी पंडितों के घर और दुकानों पर नोटिस चिपका दिए गए थे कि 24 घंटो के भीतर वे घाटी छोड़ कर चले जाए या इस्लाम ग्रहण करें. घरों पर धमकी भरें पोस्टर चिपकाने की इस बदनाम घटना से भी भारत की केंद्र व कश्मीरी सरकारें चेती नहीं और परिणाम स्वरुप पूरी घाटी में कश्मीरी पंडितों के घर धूं-धूं जल उठे. मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला इन घटनाओं पर रहस्यमयी आचरण अपनाए रहे, वे कुछ करनें का अभिनय करते रहे और कश्मीरी पंडित अपनी ही भूमि पर ताजा इतिहास की सर्वाधिक पाशविक-बर्बर-क्रूरतम गतिविधियों का खुले आम शिकार होते रहे. अराजकता चरम पर पहुँच गई, कश्मीरी पंडितों के सर काटे गए, कटे सर वाले शवों को चौक-चौराहों पर लटकाया गया. बलात्कार हुए, कश्मीरी पंडितों की स्त्रियों के साथ पाशविक-बर्बर अत्याचार हुए. गर्म सलाखें शरीर में दागी गई और इज्जत आबरू के भय से सैकड़ों कश्मीरी पंडित स्त्रियों ने आत्महत्या करनें में ही भलाई समझी. बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों के शवों का समुचित अंतिम संस्कार भी नहीं होनें दिया गया था, कश्यप ऋषि के संस्कारवान कश्मीर में संवेदनाएं समाप्त हो गई और पाशविकता-बर्बरता का वीभत्स नंगा नाच दिखा था. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और हिजबुल मुजाहिदीन ने जाहिर और सार्वजनिक तौर पर इस हत्याकांड का नेतृत्व किया था. कश्मीरी पंडितों के नेता टीकालाल टपलू की 14 सित. 1989 को दिनदहाड़े ह्त्या कर दी गई थी. अलगाववादियों को कश्मीर प्रशासन का ऐसा वरद हस्त प्राप्त रहा कि बाद में उन्होंने कश्मीरी पंडित, न्यायाधीश एन. गंजू की भी ह्त्या की और प्रतिक्रया होनें पर 320 कश्मीरी स्त्रियों,बच्चों और पुरुषों की ह्त्या कर दी थी. ऐसी कितनी ही ह्रदय विदारक, अत्याचारी और बर्बर घटनाएं कश्मीरी पंडितों के साथ घटती चली गई और दिल्ली सरकार लाचार देखती भर रही और उधर श्रीनगर की सरकार तो जैसे खुलकर इन आतताइयों के पक्ष में आ गई थी.  इसके बाद जो हुआ वह एक दुखद,क्षोभ जनक,वीभत्स,दर्दनाक और इतिहास को दहला देनें वाले काले अध्याय के रूप में सामनें आया. अन्ततोगत्वा वही हुआ जो वहां के अलगाववादी, आतंकवादी हिजबुल और जेकेएलऍफ़ चाहते थे. कश्मीरी पंडित घबराकर 19 जन. 1990 को हिम्मत हार गए. फारुख अब्दुल्ला के कुशासन में आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर आकर विजयी हुआ और इस दिन साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडित अपनें घरों, दुकानों, खेतों, बागो और संपत्तियों को छोड़कर विस्थापित होकर दर-दर की ठोकरें खानें को मजबूर हो गए. कई कश्मीरी पंडित अपनों को खोकर गए, अनेकों अपनों का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए, और हजारों तो यहाँ से निकल ही नहीं पाए और मार-काट डाले गए. विस्थापन के बाद का जो दौर आया वह भी किसी प्रकार से आतताइयों द्वारा दिए गए कष्टों से कम नहीं रहा कश्मीरी पंडितों के लिए. वे सरकारी शिविरों में नारकीय जीवन जीनें को मजबूर हुए. हजारों कश्मीरी पंडित दिल्ली, मेरठ, लखनऊ जैसे नगरों में सनस्ट्रोक से इसलिए मृत्यु को प्राप्त हो गए क्योंकि उन्हें गर्म मौसम में रहनें की आदत नहीं थी. पच्चीस वर्ष पूर्ण हुए किन्तु कश्मीरी पंडितों के घरों पर हिजबुल द्वारा नोटिस चिपकाए जानें से लेकर विस्थापन तक और विस्थापन से लेकर आज तक के समय में मानवाधिकार, मीडिया, सेमीनार, तथाकथित बुद्धिजीवी, मोमबत्ती बाज और संयुक्त राष्ट्र संघ सभी इन कश्मीरी पंडितों की समस्या का कोई ठोस हल अब तक नहीं निकाल पाए. ये सच से मूंह मोड़ने और शुतुरमुर्ग होनें का ही परिणाम है कि कश्मीरियों के साथ हुई इस घटना को शर्मनाक ढंग से स्वैक्षिक पलायन बताया गया! इस घटना को राष्ट्रीय मनावाधिकार आयोग ने सामूहिक नर संहार माननें से इंकार कर दिया; यह घोर अन्याय और तथ्यों की असंवेदी अनदेखी है!! नरेन्द्र मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास हेतु प्रतिबद्ध है और वह इस प्रतिबद्धता को दोहराती रही है किन्तु अब पच्चीस वर्षों के इस दयनीय, नारकीय और अपमानजनक अध्याय का अंत होना चाहिए. कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास, पुनर्प्रतिष्ठा, कश्मीरियत का पुनर्जागरण यह कार्य अब प्राथमिकता से होना चाहिए. इस संदर्भ में स्मरण रहना चाहिए कि 1.केंद्र सरकार के कहनें पर कश्मीरी में पुनर्वास हेतु जिस 50 एकड़ भूमि के आवंटन की बात कही गई है वह अत्यल्प है. 2. पुनर्वास की प्रत्येक चर्चा व निर्णय में पंडितों का समुचित प्रतिनिधित्व हो. 3.1989-90 के दौरान घाटी से पंडितों को हटाए जाने की जांच के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार जांच कमीशन गठि‍त करे. 4. घाटी से सुनियोजित तरीके से भगाए जाने और कश्मीरी पंडितों की हत्या के मामलों को पुनः खोला जाए और हत्यारों को सजा दी जाए.
पंडित पलायन के 26 वर्ष व भाजपा पीडीपी गठबंधन
कश्मीरी पंडितों के पलायन के 26 वर्ष पूर्ण हो जानें पर स्वाभाविक ही है कि आज कश्मीरी पुनर्वास की चर्चा हो अपितु वहां चल रहे भाजपा-पीडीपी गठबंधन की प्रतीक्षित सरकार के लक्ष्य की भी चिंता हो. यद्दपि पिछले विस चुनाव में भाजपा श्रीनगर में सत्तारूढ़ होनें में विफल रही तथापि वह रिकार्ड संख्या में विधानसभा में विराजी. तब भाजपा द्वारा पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनानें व उसके दीर्घकालीन कश्मीरी संकल्पों के मध्य बहुत से वैचारिक मतभेद व कार्यकर्ताओं का असंतोष स्वाभावतः ही मुखर हुआ था, किन्तु तब भी भाजपा ने एक दुस्साहसी किन्तु पवित्र संकल्प के साथ मुफ़्ती मोहम्मद के नेतृत्व में सरकार बना ली थी. सरकार बनानें के दस दिन बाद ही भाजपा को झटका लगा जब मुफ़्ती ने भाजपा की सहमति के बिना मसरत जैसे देशद्रोही की रिहाई करा दी व आगे और भी देशद्रोहियों की रिहाई की बात करनें लगे. ऐसा ही वैचारिक प्रतिरोध कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के संदर्भों में भी जारी रहा है.
आज कश्मीर में 19 जन.1990 को हुए जनसंहार के बाद 26 वर्षों का दीर्घ समय  बीत गया है जिसमें दिल्ली और श्रीनगर की असंवेदनशीलता के सिवा कश्मीरी पंडितों को कुछ नहीं मिला है. कश्मीर में स्वतंत्रता के समय में 15% कश्मीरी पंडितों की आबादी थी जो आज 1 % से नीचें होकर 0 % की ओर बढ़ गई है. कश्मीर के ज.स. आंकड़ों में यदि परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक खोजें तो वह एक भयावह दिन -19 जन. 1990 के नाम से जाना जाता है. 1989 से ही पाकिस्तान प्रेरित और प्रायोजित आतंकवादी और अलगाववादी यहाँ अपनी जड़ें बैठाकर पंडितों को घाटी से भगाने का लक्ष्य बना चुके थे. भारत सरकार आतंकवाद की समाप्ति में लगी हुई थी तब के दौर में वहां रह रहे ये देशभक्त कश्मीरी पंडित भारत सरकार के मित्र और इन आतंकियों और अलगाववादियों के दुशमन और खबरी सिद्ध हो रहे थे. इस दौर में कश्मीर में अलगाववादी समाज और आतंकवादियों ने इस शांतिप्रिय हिन्दू पंडित समाज के विरुद्ध चल रहे अपनें धीमें और छदम संघर्ष को घोषित संघर्ष में बदल दिया. इस भयानक नरसंहार पर फारुक अब्दुल्ला की रहस्यमयी चुप्पी और कश्मीरी पंडित विरोधी मानसिकता केवल इस घटना के समय ही सामनें नहीं आई थी. तब के दौर में फारुख अब्दुल्ला अपनें पिता शेख अब्दुल्ला के क़दमों पर चलते हुए अपना कश्मीरी पंडित विरोधी आचरण कई बार सार्वजनिक कर चुके थे. हिजबुल मुजाहिदीन नें 4 जन. 1990 को कश्मीर के स्थानीय समाचार पत्र में एक एक विज्ञप्ति प्रकाशित कराई जिसमें स्पष्टतः सभी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने की धमकी दी गई थी. उधर पाक  प्रधानमन्त्री बेनजीर नें भी कश्मीरियों को भारत से मुक्ति पानें का एक भड़काऊ भाषण दे दिया. घाटी की मस्जिदों में अजान के स्थान पर हिन्दुओं के लिए धमकियां और हिन्दुओं को खदेड़ने या मार-काट देनें के जहरीले आव्हान और भारत विरोधी नारे बजने लगे. एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र अल-सफा ने भी इस विज्ञप्ति का प्रकाशन किया था. इस भड़काऊ, नफरत, धमकी, हिंसा और भय से भरे शब्दों और आशय वाली विज्ञप्ति के प्रकाशन के बाद कश्मीरी पंडितों में गहरें तक भय, डर घबराहट का संचार हो गया. यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तब तक कश्मीरी पंडितों के विरोध में कई छोटी बड़ी घटनाएं वहां सतत घट ही रही थी और कश्मीरी प्रशासन और भारत सरकार दोनों ही उन पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे थे. 19जन. 1990 की भीषणता को और कश्मीर और भारत सरकार की विफलता को इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि पूरी घाटी में कश्मीरी पंडितों के घर और दुकानों पर नोटिस चिपका दिए गए थे कि 24 घंटो के भीतर वे घाटी छोड़ कर चले जाए या इस्लाम ग्रहण करें. घरों पर धमकी भरें पोस्टर चिपकाने की इस बदनाम घटना से भी भारत की केंद्र व कश्मीरी सरकारें चेती नहीं और परिणाम स्वरुप पूरी घाटी में कश्मीरी पंडितों के घर धूं-धूं जल उठे. मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला इन घटनाओं पर रहस्यमयी आचरण अपनाए रहे, वे कुछ करनें का अभिनय करते रहे और कश्मीरी पंडित अपनी ही भूमि पर ताजा इतिहास की सर्वाधिक पाशविक-बर्बर-क्रूरतम गतिविधियों का खुले आम शिकार होते रहे. अराजकता चरम पर पहुँच गई, कश्मीरी पंडितों के सर काटे गए, कटे सर वाले शवों को चौक-चौराहों पर लटकाया गया. बलात्कार हुए, कश्मीरी पंडितों की स्त्रियों के साथ पाशविक-बर्बर अत्याचार हुए. गर्म सलाखें शरीर में दागी गई और इज्जत आबरू के भय से सैकड़ों कश्मीरी पंडित स्त्रियों ने आत्महत्या करनें में ही भलाई समझी. बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों के शवों का समुचित अंतिम संस्कार भी नहीं होनें दिया गया था, कश्यप ऋषि के संस्कारवान कश्मीर में संवेदनाएं समाप्त हो गई और पाशविकता-बर्बरता का वीभत्स नंगा नाच दिखा था. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और हिजबुल मुजाहिदीन ने जाहिर और सार्वजनिक तौर पर इस हत्याकांड का नेतृत्व किया था. कश्मीरी पंडितों के नेता टीकालाल टपलू की 14 सित. 1989 को दिनदहाड़े ह्त्या कर दी गई थी. अलगाववादियों को कश्मीर प्रशासन का ऐसा वरद हस्त प्राप्त रहा कि बाद में उन्होंने कश्मीरी पंडित, न्यायाधीश एन. गंजू की भी ह्त्या की और प्रतिक्रया होनें पर 320 कश्मीरी स्त्रियों,बच्चों और पुरुषों की ह्त्या कर दी थी. ऐसी कितनी ही ह्रदय विदारक, अत्याचारी और बर्बर घटनाएं कश्मीरी पंडितों के साथ घटती चली गई और दिल्ली सरकार लाचार देखती भर रही और उधर श्रीनगर की सरकार तो जैसे खुलकर इन आतताइयों के पक्ष में आ गई थी.  इसके बाद जो हुआ वह एक दुखद,क्षोभ जनक,वीभत्स,दर्दनाक और इतिहास को दहला देनें वाले काले अध्याय के रूप में सामनें आया. अन्ततोगत्वा वही हुआ जो वहां के अलगाववादी, आतंकवादी हिजबुल और जेकेएलऍफ़ चाहते थे. कश्मीरी पंडित घबराकर 19 जन. 1990 को हिम्मत हार गए. फारुख अब्दुल्ला के कुशासन में आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर आकर विजयी हुआ और इस दिन साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडित अपनें घरों, दुकानों, खेतों, बागो और संपत्तियों को छोड़कर विस्थापित होकर दर-दर की ठोकरें खानें को मजबूर हो गए. कई कश्मीरी पंडित अपनों को खोकर गए, अनेकों अपनों का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए, और हजारों तो यहाँ से निकल ही नहीं पाए और मार-काट डाले गए. विस्थापन के बाद का जो दौर आया वह भी किसी प्रकार से आतताइयों द्वारा दिए गए कष्टों से कम नहीं रहा कश्मीरी पंडितों के लिए. वे सरकारी शिविरों में नारकीय जीवन जीनें को मजबूर हुए. हजारों कश्मीरी पंडित दिल्ली, मेरठ, लखनऊ जैसे नगरों में सनस्ट्रोक से इसलिए मृत्यु को प्राप्त हो गए क्योंकि उन्हें गर्म मौसम में रहनें की आदत नहीं थी. पच्चीस वर्ष पूर्ण हुए किन्तु कश्मीरी पंडितों के घरों पर हिजबुल द्वारा नोटिस चिपकाए जानें से लेकर विस्थापन तक और विस्थापन से लेकर आज तक के समय में मानवाधिकार, मीडिया, सेमीनार, तथाकथित बुद्धिजीवी, मोमबत्ती बाज और संयुक्त राष्ट्र संघ सभी इन कश्मीरी पंडितों की समस्या का कोई ठोस हल अब तक नहीं निकाल पाए. ये सच से मूंह मोड़ने और शुतुरमुर्ग होनें का ही परिणाम है कि कश्मीरियों के साथ हुई इस घटना को शर्मनाक ढंग से स्वैक्षिक पलायन बताया गया! इस घटना को राष्ट्रीय मनावाधिकार आयोग ने सामूहिक नर संहार माननें से इंकार कर दिया; यह घोर अन्याय और तथ्यों की असंवेदी अनदेखी है!! नरेन्द्र मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास हेतु प्रतिबद्ध है और वह इस प्रतिबद्धता को दोहराती रही है किन्तु अब पच्चीस वर्षों के इस दयनीय, नारकीय और अपमानजनक अध्याय का अंत होना चाहिए. कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास, पुनर्प्रतिष्ठा, कश्मीरियत का पुनर्जागरण यह कार्य अब प्राथमिकता से होना चाहिए. इस संदर्भ में स्मरण रहना चाहिए कि 1.केंद्र सरकार के कहनें पर कश्मीरी में पुनर्वास हेतु जिस 50 एकड़ भूमि के आवंटन की बात कही गई है वह अत्यल्प है. 2. पुनर्वास की प्रत्येक चर्चा व निर्णय में पंडितों का समुचित प्रतिनिधित्व हो. 3.1989-90 के दौरान घाटी से पंडितों को हटाए जाने की जांच के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार जांच कमीशन गठि‍त करे. 4. घाटी से सुनियोजित तरीके से भगाए जाने और कश्मीरी पंडितों की हत्या के मामलों को पुनः खोला जाए और हत्यारों को सजा दी जाए.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
April 21, 2016

काश्मीरी पंडितों का दर्द तो अनसुना ही रह गया । किसी ने उनकी सुध नहीं ली । उनके लिए तो काश्मीर मानो पाकिस्तान बन गया । फ़ारूख अब्दुल्ला तो शुरू से दोगले, बेशर्म और निकम्मे रहे हैं लेकिन केंद्रीय सरकार में उस समय गृहमंत्री के ओहदे पर बैठे मुफ़्ती मोहम्मद सईद और प्रधानमंत्री के ओहदे पर बैठे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी अपने फर्ज़ के साथ बेईमानी ही की । काश्मीरी पंडितों को सभी ने धोखा दिया । वे अपने ही देश में मोहाज़िर बनकर रह गए । जिस काश्मीर में उनके लिए जगह नहीं, उस काश्मीर को अपने पास रखकर भी क्या फ़ायदा ? उसे पालते रहना तो अपने ही देश में एक पाकिस्तान को पालते रहना है ।

rameshagarwal के द्वारा
January 20, 2016

जय श्री राम प्रवीण जी आपके इस सुन्दर मर्मस्पर्शी लेख की बड़ाई के लिए हमारे पास शब्द नहीं फारुक अब्दुला ने दिखा दिया की वे पहले मुसलमान और फिट भारती लेकिन गलती केंद्र की सरकार की है जिसको फारुक सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शाशन लगा देना चाइये था.विश्व नाथ प्रताप सिंह की गलती जिन्होंने जग मोहन को राज्यपाल से हटा लिया नहीं तो शय हालत ऐसे नहीं होते दादरी की एक घटना पर तूफ़ान उठाने वाले इस असवेदना पर चुप येमुस्लिम तुष्टीकरण की नीति है न कोइ असहिष्णुता की आवाज़ न कोइ अवार्ड वापसी न ही मानव्दीकार न ही संयुक्त राष्ट्र संघ यदि मुसलमानों के साथ होता तो पुरे देश में भूकंप आ जाता.हमारे हिसाब से हफ्ते का सबसे बढ़िया लेख.बधाई और साधुवाद


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