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बिहार सेमी फाइनल: बिहार सेमी फाइनल: लालू-नितीश महाविलय की महा पराजय

Posted On: 24 Jul, 2015 Others में

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बिहार सेमी फाइनल: बिहार सेमी फाइनल: लालू-नितीश महाविलय की महा पराजय

कुछ महीनों पूर्व खंड-खंड हुए जनता दल परिवार के एक होनें के समाचार यूं सुनाये जा रहे थे जैसे इसके एक हो जानें से सम्पूर्ण राजनैतिक परिदृश्य परिवर्तित हो जाएगा. भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते वर्चस्व तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभा मंडल की आभा इतनी बढ़ी कि अन्य सभी राजनैतिक दल इसकी तपिश से झुलसनें लगे. इस महा गठबंधन के नाम मुलायम सिंह ने सभी पर डोरे डाले – सपा, जदयू, जनता दल एस, सजपा, राजद, लोकदल आदि सभी राजनीतिक दलों की चौपाल लगी. चौपाल पर लालू यादव, देवेगौड़ा, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, चौटाला परिवार, कमल मुरारका आदि सभी नेताओं की बिसात बिछी. बीजद के नविन पटनायक तथा तृणमूल की ममता बनर्जी भी इस बिसात की खोज-खबर-चिंता करते देखे गए थे. इस पुरे गठबंधन की तात्कालिक धुरी या लक्ष्य बिहार विधानसभा के अतिशीघ्र होनें वाले चुनाव हैं. बिहार में लालू-नीतिश-कांग्रेस गठबंधन को लेकर तरह तरह से ताल ठौंकी गई थी. लालू यादव तथा नीतीश कुमार तो अपनें बड़बोले स्वभाव के अनुरूप हर अवसर पर इस गठबंधन के नाम डींगे मारते देखे गए थे. साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे और भाजपा को बिहार में करारी शिकस्त देंगे, यह वातावरण निर्मित कर दिया गया था. इसके विपरीत भाजपा इस गठबंधन को लेकर गंभीर थी, उसनें परिस्थितियों पर पैनी नजर राखी और कभी भी इस गठबंधन के विपरीत अनावश्यक बयानबाजी करती नहीं दिखाई दी. इस गठबंधन में नेतृत्व का संकट भी बहुत चला! नेतृत्व करनें को लेकर तथा बिहार के भावी मुख्यमंत्री के प्रोजेक्शन को लेकर आपसी मतभेद थे और अब भी हैं. नीतीश के नेतृत्व में इस महा गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा भी! तुर्रा यह की बिहार में इस गठबंधन में कथित तौर पर वहां के महाबली मानें जानें वाले नेता नीतीश कुमार, लालू यादव तथा कांग्रेस तीनों ही एकमत एक दिशा होकर चलनें लगे. हाल ही में हुए बिहार विधान परिषद् के 24 सीटों के लिए होनें वाले चुनाव में जदयू, राजद, कांग्रेस तथा वामदल साथ मिलकर चुनाव लड़े थे. दस-दस सीटों पर राजद, जदयू तथा चार पर कांग्रेस व वामदल चुनाव लड़े थे. इस चुनाव की अहम् बात यह थी कि इस महाविलय की सफलता सुनिश्चित करनें हेतु नीतीश कुमार कुछ ऐसी सीटों को भी गठबंधन के साथियों को दे बैठे थे जहाँ उनके दल की विजय सुनिश्चित थी और उन सीटों पर अब महाविलय पराजित हो गया है. वस्तुतः ऐसा करके नीतीश कुमार गठबंधन की नैया पार लगानें का काम नहीं अपितु स्वयं के मुख्यमंत्री बननें का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे. अब निश्चित ही उनके इस तथाकथित त्याग और नुक्सान का हिसाब उनका अपना ही दल मांगेगा और एक नया असंतोष स्वर विकसित होगा. विधान परिषद के स्थानीय निकाय कोटे की 24 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा-लोजपा-रालोसपा गठबंधन का आधे से अधिक सीटों पर विजयी होना बिहार में महाविलय को प्रश्नवाचक घेरे में खड़ा कर गया है. 12 सीटों पर भाजपा गठबंधन के साथ दो सीटों पर निर्दलीय जीतें है और बड़े बड़े ढोल पीटने और बड़े बड़े दावे करनें वाला कथित लालू-नीतीश महाविलय मात्र दस पर विजयी हो पाया है. मुख्यमंत्री नीतीश के राज में स्वाभाविक तौर पर महाविलय को सत्ता का पूर्ण सहयोग मिला, राज्य के विभिन्न मंत्री प्रत्येक को प्रत्येक सीट पर जवाबदेही के साथ लगाया गया था. महाविलय ने धन बल का भरपूर प्रदर्शन किया, मुख्यमंत्री नीतीश स्वयं पहली बार प्रत्याशियों के नामांकन हेतु निकले, लालू स्वयं भी प्रचार अभियान में निकले, किन्तु इस सब का भी कोई परिणाम नहीं निकला. जदयू की सत्ता के विरुद्ध एक स्वाभाविक किंतु तीक्ष्ण लहर थी जिसका दुष्परिणाम नीतीश को झेलना ही था. भाजपा एनडीए का पांच सीटों से बारह पर पहुंचना तथा तथा जदयू सहित महाविलय का 19 सीटों से दस पर आना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एनडीए की आंधी का मुकाबला न नीतीश अकेले कर सकतें हैं और न ही लालू के साथ! विभिन्न क्षेत्रों में यदि क्षेत्रवार देखा जाए तो भी एनडीए की जीत के आंकड़े एक नई कहानी लिखनें को तत्पर दीखते हैं. मिथिलांचल पर भगवा लहरानें को, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा जैसी सीटों के जीतनें को सम्पूर्ण बिहार में सुखद आश्चर्य की दृष्टि से देखा जा रहा है. मगध पूर्वी बिहार में भाजपा के दबदबे, सारण की तीनों सीटों तथा भोजपुर में भी भाजपा की जीत से लालू नीतीश सहित समूचे महाविलय के माथे पर बल पड़ गए हैं. सारण की तीन और भोजपुर सीट ने तो जैसे लालू के बचे खुचे तिलिस्म के छिन्न भिन्न होकर बिखर जानें का ऐलान ही कर दिया है. इन परिणामों ने आगामी विधानसभा में यादव वोटों पर लालू के क्षीण से क्षीणतर होते प्रभाव को अभी से स्पष्ट कर दिया है, यादव वोटों के इस ट्रेंड से लालू की भूमिका महाविलय में असंतुलित तथा छोटी हो सकती है. कानोंकान यह पुड़िया भी चल रही है कि लालू ने अपनें यादव वोट बैंक को महाविलय के पक्ष में पूरी तरह शिफ्ट करनें में कूटनीति का सहारा लिया है और वे महाविलय के प्रति सौ प्रतिशत ईमानदारी से नहीं आयें है. अब लालू को यादव वोट कम मिल रहें हों या लालू यादव वोटों को पूरी तरह जदयू उआ महाविलय के पक्ष में शिफ्ट न कर रहें हों; दोनों ही स्थितियां भाजपा गठबंधन के पक्ष में वातावरण बनाती दिख रही हैं. सर्वविदित है कि बिहार में होनें वाले चुनावों में वोट मैनेजरों की भूमिका बड़ी ही सशक्त होती है, इनके बल पर ही समूची चुनावी रणनीति तय की जाती है. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भाजपा तो अपनें कैडर बेस्ड संगठन के कारण वोट मैनेजरों पर उतना निर्भर नहीं करती है जितनी कि बिहार की अन्य राजनैतिक पार्टियां निर्भर होती है. महाविलय के लिए खतरे की घंटी यह हो गई कि इस चुनाव में उसके वोट मैनेजरों का गणित पूरी तरह गड्डम गड्ड हो गया है. लालू-निबिहार सेमी फाइनल: बिहार सेमी फाइनल: लालू-नितीश महाविलय की महा पराजय कुछ महीनों पूर्व खंड-खंड हुए जनता दल परिवार के एक होनें बिहार सेमी फाइनल: लालू-नितीश महाविलय की महा पराजय कुछ महीनों पूर्व खंड-खंड हुए जनता दल परिवार के एक होनें के समाचार यूं सुनाये जा रहे थे जैसे इसके एक हो जानें से सम्पूर्ण राजनैतिक परिदृश्य परिवर्तित हो जाएगा. भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते वर्चस्व तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभा मंडल की आभा इतनी बढ़ी कि अन्य सभी राजनैतिक दल इसकी तपिश से झुलसनें लगे. इस महा गठबंधन के नाम मुलायम सिंह ने सभी पर डोरे डाले – सपा, जदयू, जनता दल एस, सजपा, राजद, लोकदल आदि सभी राजनीतिक दलों की चौपाल लगी. चौपाल पर लालू यादव, देवेगौड़ा, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, चौटाला परिवार, कमल मुरारका आदि सभी नेताओं की बिसात बिछी. बीजद के नविन पटनायक तथा तृणमूल की ममता बनर्जी भी इस बिसात की खोज-खबर-चिंता करते देखे गए थे. इस पुरे गठबंधन की तात्कालिक धुरी या लक्ष्य बिहार विधानसभा के अतिशीघ्र होनें वाले चुनाव हैं. बिहार में लालू-नीतिश-कांग्रेस गठबंधन को लेकर तरह तरह से ताल ठौंकी गई थी. लालू यादव तथा नीतीश कुमार तो अपनें बड़बोले स्वभाव के अनुरूप हर अवसर पर इस गठबंधन के नाम डींगे मारते देखे गए थे. साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे और भाजपा को बिहार में करारी शिकस्त देंगे, यह वातावरण निर्मित कर दिया गया था. इसके विपरीत भाजपा इस गठबंधन को लेकर गंभीर थी, उसनें परिस्थितियों पर पैनी नजर राखी और कभी भी इस गठबंधन के विपरीत अनावश्यक बयानबाजी करती नहीं दिखाई दी. इस गठबंधन में नेतृत्व का संकट भी बहुत चला! नेतृत्व करनें को लेकर तथा बिहार के भावी मुख्यमंत्री के प्रोजेक्शन को लेकर आपसी मतभेद थे और अब भी हैं. नीतीश के नेतृत्व में इस महा गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा भी! तुर्रा यह की बिहार में इस गठबंधन में कथित तौर पर वहां के महाबली मानें जानें वाले नेता नीतीश कुमार, लालू यादव तथा कांग्रेस तीनों ही एकमत एक दिशा होकर चलनें लगे. हाल ही में हुए बिहार विधान परिषद् के 24 सीटों के लिए होनें वाले चुनाव में जदयू, राजद, कांग्रेस तथा वामदल साथ मिलकर चुनाव लड़े थे. दस-दस सीटों पर राजद, जदयू तथा चार पर कांग्रेस व वामदल चुनाव लड़े थे. इस चुनाव की अहम् बात यह थी कि इस महाविलय की सफलता सुनिश्चित करनें हेतु नीतीश कुमार कुछ ऐसी सीटों को भी गठबंधन के साथियों को दे बैठे थे जहाँ उनके दल की विजय सुनिश्चित थी और उन सीटों पर अब महाविलय पराजित हो गया है. वस्तुतः ऐसा करके नीतीश कुमार गठबंधन की नैया पार लगानें का काम नहीं अपितु स्वयं के मुख्यमंत्री बननें का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे. अब निश्चित ही उनके इस तथाकथित त्याग और नुक्सान का हिसाब उनका अपना ही दल मांगेगा और एक नया असंतोष स्वर विकसित होगा. विधान परिषद के स्थानीय निकाय कोटे की 24 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा-लोजपा-रालोसपा गठबंधन का आधे से अधिक सीटों पर विजयी होना बिहार में महाविलय को प्रश्नवाचक घेरे में खड़ा कर गया है. 12 सीटों पर भाजपा गठबंधन के साथ दो सीटों पर निर्दलीय जीतें है और बड़े बड़े ढोल पीटने और बड़े बड़े दावे करनें वाला कथित लालू-नीतीश महाविलय मात्र दस पर विजयी हो पाया है. मुख्यमंत्री नीतीश के राज में स्वाभाविक तौर पर महाविलय को सत्ता का पूर्ण सहयोग मिला, राज्य के विभिन्न मंत्री प्रत्येक को प्रत्येक सीट पर जवाबदेही के साथ लगाया गया था. महाविलय ने धन बल का भरपूर प्रदर्शन किया, मुख्यमंत्री नीतीश स्वयं पहली बार प्रत्याशियों के नामांकन हेतु निकले, लालू स्वयं भी प्रचार अभियान में निकले, किन्तु इस सब का भी कोई परिणाम नहीं निकला. जदयू की सत्ता के विरुद्ध एक स्वाभाविक किंतु तीक्ष्ण लहर थी जिसका दुष्परिणाम नीतीश को झेलना ही था. भाजपा एनडीए का पांच सीटों से बारह पर पहुंचना तथा तथा जदयू सहित महाविलय का 19 सीटों से दस पर आना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एनडीए की आंधी का मुकाबला न नीतीश अकेले कर सकतें हैं और न ही लालू के साथ! विभिन्न क्षेत्रों में यदि क्षेत्रवार देखा जाए तो भी एनडीए की जीत के आंकड़े एक नई कहानी लिखनें को तत्पर दीखते हैं. मिथिलांचल पर भगवा लहरानें को, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा जैसी सीटों के जीतनें को सम्पूर्ण बिहार में सुखद आश्चर्य की दृष्टि से देखा जा रहा है. मगध पूर्वी बिहार में भाजपा के दबदबे, सारण की तीनों सीटों तथा भोजपुर में भी भाजपा की जीत से लालू नीतीश सहित समूचे महाविलय के माथे पर बल पड़ गए हैं. सारण की तीन और भोजपुर सीट ने तो जैसे लालू के बचे खुचे तिलिस्म के छिन्न भिन्न होकर बिखर जानें का ऐलान ही कर दिया है. इन परिणामों ने आगामी विधानसभा में यादव वोटों पर लालू के क्षीण से क्षीणतर होते प्रभाव को अभी से स्पष्ट कर दिया है, यादव वोटों के इस ट्रेंड से लालू की भूमिका महाविलय में असंतुलित तथा छोटी हो सकती है. कानोंकान यह पुड़िया भी चल रही है कि लालू ने अपनें यादव वोट बैंक को महाविलय के पक्ष में पूरी तरह शिफ्ट करनें में कूटनीति का सहारा लिया है और वे महाविलय के प्रति सौ प्रतिशत ईमानदारी से नहीं आयें है. अब लालू को यादव वोट कम मिल रहें हों या लालू यादव वोटों को पूरी तरह जदयू उआ महाविलय के पक्ष में शिफ्ट न कर रहें हों; दोनों ही स्थितियां भाजपा गठबंधन के पक्ष में वातावरण बनाती दिख रही हैं. सर्वविदित है कि बिहार में होनें वाले चुनावों में वोट मैनेजरों की भूमिका बड़ी ही सशक्त होती है, इनके बल पर ही समूची चुनावी रणनीति तय की जाती है. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भाजपा तो अपनें कैडर बेस्ड संगठन के कारण वोट मैनेजरों पर उतना निर्भर नहीं करती है जितनी कि बिहार की अन्य राजनैतिक पार्टियां निर्भर होती है. महाविलय के लिए खतरे की घंटी यह हो गई कि इस चुनाव में उसके वोट मैनेजरों का गणित पूरी तरह गड्डम गड्ड हो गया है. के समाचार यूं सुनाये जा रहे थे जैसे इसके एक हो जानें से सम्पूर्ण राजनैतिक परिदृश्य परिवर्तित हो जाएगा. भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते वर्चस्व तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभा मंडल की आभा इतनी बढ़ी कि अन्य सभी राजनैतिक दल इसकी तपिश से झुलसनें लगे. इस महा गठबंधन के नाम मुलायम सिंह ने सभी पर डोरे डाले – सपा, जदयू, जनता दल एस, सजपा, राजद, लोकदल आदि सभी राजनीतिक दलों की चौपाल लगी. चौपाल पर लालू यादव, देवेगौड़ा, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, चौटाला परिवार, कमल मुरारका आदि सभी नेताओं की बिसात बिछी. बीजद के नविन पटनायक तथा तृणमूल की ममता बनर्जी भी इस बिसात की खोज-खबर-चिंता करते देखे गए थे. इस पुरे गठबंधन की तात्कालिक धुरी या लक्ष्य बिहार विधानसभा के अतिशीघ्र होनें वाले चुनाव हैं. बिहार में लालू-नीतिश-कांग्रेस गठबंधन को लेकर तरह तरह से ताल ठौंकी गई थी. लालू यादव तथा नीतीश कुमार तो अपनें बड़बोले स्वभाव के अनुरूप हर अवसर पर इस गठबंधन के नाम डींगे मारते देखे गए थे. साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे और भाजपा को बिहार में करारी शिकस्त देंगे, यह वातावरण निर्मित कर दिया गया था. इसके विपरीत भाजपा इस गठबंधन को लेकर गंभीर थी, उसनें परिस्थितियों पर पैनी नजर राखी और कभी भी इस गठबंधन के विपरीत अनावश्यक बयानबाजी करती नहीं दिखाई दी. इस गठबंधन में नेतृत्व का संकट भी बहुत चला! नेतृत्व करनें को लेकर तथा बिहार के भावी मुख्यमंत्री के प्रोजेक्शन को लेकर आपसी मतभेद थे और अब भी हैं. नीतीश के नेतृत्व में इस महा गठबंधन ने मिलकर चुनाव लड़ा भी! तुर्रा यह की बिहार में इस गठबंधन में कथित तौर पर वहां के महाबली मानें जानें वाले नेता नीतीश कुमार, लालू यादव तथा कांग्रेस तीनों ही एकमत एक दिशा होकर चलनें लगे. हाल ही में हुए बिहार विधान परिषद् के 24 सीटों के लिए होनें वाले चुनाव में जदयू, राजद, कांग्रेस तथा वामदल साथ मिलकर चुनाव लड़े थे. दस-दस सीटों पर राजद, जदयू तथा चार पर कांग्रेस व वामदल चुनाव लड़े थे. इस चुनाव की अहम् बात यह थी कि इस महाविलय की सफलता सुनिश्चित करनें हेतु नीतीश कुमार कुछ ऐसी सीटों को भी गठबंधन के साथियों को दे बैठे थे जहाँ उनके दल की विजय सुनिश्चित थी और उन सीटों पर अब महाविलय पराजित हो गया है. वस्तुतः ऐसा करके नीतीश कुमार गठबंधन की नैया पार लगानें का काम नहीं अपितु स्वयं के मुख्यमंत्री बननें का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे. अब निश्चित ही उनके इस तथाकथित त्याग और नुक्सान का हिसाब उनका अपना ही दल मांगेगा और एक नया असंतोष स्वर विकसित होगा. विधान परिषद के स्थानीय निकाय कोटे की 24 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा-लोजपा-रालोसपा गठबंधन का आधे से अधिक सीटों पर विजयी होना बिहार में महाविलय को प्रश्नवाचक घेरे में खड़ा कर गया है. 12 सीटों पर भाजपा गठबंधन के साथ दो सीटों पर निर्दलीय जीतें है और बड़े बड़े ढोल पीटने और बड़े बड़े दावे करनें वाला कथित लालू-नीतीश महाविलय मात्र दस पर विजयी हो पाया है. मुख्यमंत्री नीतीश के राज में स्वाभाविक तौर पर महाविलय को सत्ता का पूर्ण सहयोग मिला, राज्य के विभिन्न मंत्री प्रत्येक को प्रत्येक सीट पर जवाबदेही के साथ लगाया गया था. महाविलय ने धन बल का भरपूर प्रदर्शन किया, मुख्यमंत्री नीतीश स्वयं पहली बार प्रत्याशियों के नामांकन हेतु निकले, लालू स्वयं भी प्रचार अभियान में निकले, किन्तु इस सब का भी कोई परिणाम नहीं निकला. जदयू की सत्ता के विरुद्ध एक स्वाभाविक किंतु तीक्ष्ण लहर थी जिसका दुष्परिणाम नीतीश को झेलना ही था. भाजपा एनडीए का पांच सीटों से बारह पर पहुंचना तथा तथा जदयू सहित महाविलय का 19 सीटों से दस पर आना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एनडीए की आंधी का मुकाबला न नीतीश अकेले कर सकतें हैं और न ही लालू के साथ! विभिन्न क्षेत्रों में यदि क्षेत्रवार देखा जाए तो भी एनडीए की जीत के आंकड़े एक नई कहानी लिखनें को तत्पर दीखते हैं. मिथिलांचल पर भगवा लहरानें को, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा जैसी सीटों के जीतनें को सम्पूर्ण बिहार में सुखद आश्चर्य की दृष्टि से देखा जा रहा है. मगध पूर्वी बिहार में भाजपा के दबदबे, सारण की तीनों सीटों तथा भोजपुर में भी भाजपा की जीत से लालू नीतीश सहित समूचे महाविलय के माथे पर बल पड़ गए हैं. सारण की तीन और भोजपुर सीट ने तो जैसे लालू के बचे खुचे तिलिस्म के छिन्न भिन्न होकर बिखर जानें का ऐलान ही कर दिया है. इन परिणामों ने आगामी विधानसभा में यादव वोटों पर लालू के क्षीण से क्षीणतर होते प्रभाव को अभी से स्पष्ट कर दिया है, यादव वोटों के इस ट्रेंड से लालू की भूमिका महाविलय में असंतुलित तथा छोटी हो सकती है. कानोंकान यह पुड़िया भी चल रही है कि लालू ने अपनें यादव वोट बैंक को महाविलय के पक्ष में पूरी तरह शिफ्ट करनें में कूटनीति का सहारा लिया है और वे महाविलय के प्रति सौ प्रतिशत ईमानदारी से नहीं आयें है. अब लालू को यादव वोट कम मिल रहें हों या लालू यादव वोटों को पूरी तरह जदयू उआ महाविलय के पक्ष में शिफ्ट न कर रहें हों; दोनों ही स्थितियां भाजपा गठबंधन के पक्ष में वातावरण बनाती दिख रही हैं. सर्वविदित है कि बिहार में होनें वाले चुनावों में वोट मैनेजरों की भूमिका बड़ी ही सशक्त होती है, इनके बल पर ही समूची चुनावी रणनीति तय की जाती है. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भाजपा तो अपनें कैडर बेस्ड संगठन के कारण वोट मैनेजरों पर उतना निर्भर नहीं करती है जितनी कि बिहार की अन्य राजनैतिक पार्टियां निर्भर होती है. महाविलय के लिए खतरे की घंटी यह हो गई कि इस चुनाव में उसके वोट मैनेजरों का गणित पूरी तरह गड्डम गड्ड हो गया है. लालू-नितीश महाविलय की महा पराजय तीश महाविलय की महा पराजय

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