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पिछले वर्ष की आठ घटनाएँ जिनसे पाक के हौसले बुलंद हुए:भाग २

Posted On: 10 Aug, 2013 Others में

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भाग: 2

पिछले वर्ष की आठ घटनाएँ जिनसे पाक के हौसले बुलंद हुए

पाक द्वारा हमारें पांच सैनिकों की ह्त्या का दुस्साहस हमारी पिछली चुप्पियों का परिणाम है!!

दिसंबर, 2012 – पाक गृह मंत्री ने भारत आकर अनाधिकृत और अनावश्यक छेड़ा संवेदन शील मुद्दों को, और हम चुप रहे-

भारत यात्रा पर आये पाकिस्तानी गृह मंत्री रहमान मलिक ने विवाद उत्पन्न करनें की शैतानी मानसिकता से भारत आकर कहा था कि “26/11 हमलों में शामिल होने का आरोप झेल रहे हाफ़िज़ सईद के खिलाफ, चरमपंथी अजमल कसाब के बयान के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती.” पाकिस्तान और विशेषतः भारत दोनों देशों के विदेश सचिवों को इस बात पर विचार करना होगा की यदि अब अगर कसाब के बयान का कोई अर्थ न माननें की ही कसम यदि पाकिस्तानी प्रशासन ने ठान ली है तो फिर न्यायिक आयोग के भारत आनें का अर्थ और उद्देश्य ही क्या रह जाता है??किन्तु पुरे देश को हैरानी में डालते हुए हमारें विदेश, गृह, रक्षा और प्रधानमन्त्री ने इस मुद्दें पर लगभग चुप्पी बनाए रखी थी. तब उलझानें वाले बयानों को जारी करनें के मिशन पर ही आये रहमान मालिक ने 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया को जेनेवा नियमों के विरूद्ध यातना पूर्ण और पाशविक ढंग से मार दिए जानें पर कहा, “मैं नहीं कह सकता कि सौरभ कालिया की मौत पाकिस्तानी सेना की गोलियों से हुई थी या वो खराब मौसम का शिकार हुए थे.” तब भारतीय गृह मंत्री सुशिल शिंदें द्वारा यह बात दृढ़तापूर्वक बताई जानी चाहिए थी कि ख़राब मौसम से सौरभ कालिया की आँखें बाहर नहीं निकल सकती थी और न ही सौरभ कालिया के शारीर पर सिगरेट से से दागे जानें के निशान खराब मौसम के कारण आ सकतें थे!! किन्तु भारतीय राजनय और अन्य सभी चुप् ही रहे थे.

इस प्रवास में ही आगे चलें तो पाकिस्तानी गृह मंत्री ने फरमाया था कि ” 26.11 का मुंबई हमलों का अपराधी अबू जुंदाल भारतीय था और भारतीय एजेंसियों के लिए काम करता था जो बाद में पलट गया.” रहमान मलिक से तब किसी ने यह नहीं पूछा था कि “अबू जुंदाल अगर भारतीय एजेंट था तो क्यों पाकिस्तान की सरकार उसके सऊदी अरब से भारत प्रत्यर्पण के खिलाफ थी? और क्यों उसे पाकिस्तानी नागरिक बताया जा रहा था?? क्यों पूरा पाकिस्तानी प्रशासन अबू जिंदाल की चिंता में अधीर हो रहा था??? यह वही रहमान मलिक थे जिन्होंने अजमल आमिर कसाब की गिरफ्तारी के बाद उसे पाकिस्तानी मानने से यह कह कर इनकार कर दिया था उसका पाकिस्तानी जनसंख्या पंजीकरण प्राधिकरण में कोई रिकॉर्ड नहीं है.” किन्तु अवसर उपयुक्त और तवा बेहद गर्म होनें पर भी किसी भारतीय पक्ष ने उनके सामनें ये बातें नहीं रखी थी.

तब भारत आये रहमान मलिक ने अपनें बारूदी मूंह से शब्द दागना यहाँ बंद नहीं किया और दिल्ली में आगे कहा था कि “हम और बंबई धमाके नहीं चाहते, हम और समझौता एक्सप्रेस नहीं चाहते हम और बाबरी मस्जिद नहीं चाहते हम भारत पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र में शांति के लिए साथ काम करना चाहते हैं.” हमारी यु पी ए सरकार, हमारें प्रधानमन्त्री मौन सिंह और सुशिल शिंदे समझें न समझें पर कुटिल रहमान मलिक समझतें थे कि 26.11 की आतंकवादी घटना से भारत की आंतरिक और सामाजिक घटना बाबरी विध्वंस में तुलना करके उन्होंने क्या हासिल कर लिया था और भारत ने क्या खो दिया था!! यद्दपि पाकिस्तानी मंत्री बाद में इस बयान से भी पलट गए थे और उन्होंने कहा था कि उनके बयान के गलत अर्थ निकाले गए तथापि निस्संदेह यह एक शैतानी भरी शरारत थी जिसे हमनें चुपचाप सहन किया था.

रहमान मलिक की बातों से तब स्पष्टतः ऐसा लगता था कि पाकिस्तानी मंत्री यह कहना चाहते थे कि यदि बाबरी का कलंक भारत से हटानें का उपक्रम भारत में नहीं होता तो मुंबई में 26.11 भी नहीं होता!! भारत पाकिस्तानी संबंधों के बेहद संवेदनशील स्थितियों में होनें के उपरान्त भी रहमान मालिक का 26.11 और बाबरी विध्वंस की तुलना का यह दुस्साहस भरा बयान यु पी ए सरकार के कानों पर कोई हरकत कर गया हो या नहीं यह तो पता नहीं चला किन्तु पुरे राष्ट्र में इस बात को लेकर बेहद गुस्सा और गुबार जरूर था. तब भारत द्वारा पाकिस्तान से यह पूछा जाना चाहिये था कि किस हैसियत से उसनें भारत के इस संवेदनशील अंदरूनी सामाजिक विषय को छुनें की हिमाकत की है? यु पी ए सरकार द्वारा पाकिस्तान सहित समूचे विश्व को यह भी चुनौती पूर्वक बताया जाना चाहिए था कि बाबरी विध्वंस कोई सैनिक कार्यवाही या प्रशासनिक गतिविधि नहीं बल्कि एक सामजिक आक्रोश का परिणाम था जी शुद्ध और शुद्धतम रूप से भारत का अंदरूनी मामला है और इसकी इस प्रकार चर्चा करके पाकिस्तान ने भारतीय संप्रभुता की सीमा को अतिक्रमित करनें का प्रयास किया है. भारतीय धरती पर बाबरी ढांचें का अस्तित्व और विध्वंस एक प्रतीकात्मक घटना है जिसे भारतीय इतिहास की पूंजी समझा जा सकता है! “यह अन्तराष्ट्रीय अखाड़े की चर्चा का नहीं बल्कि हमारी अस्मिता और हमारी अंतस वेदना का एक अमिट अध्याय है जिस सम्बन्ध में पाकिस्तान सहित समूचे विश्व को चुप्पी बनाएं रखनी होगी” – यह भी बताया जाना चाहिए था. पाकिस्तान से यह भी नाराजगी पूर्वक कहा जाना चाहिए थी कि बाबरी ढांचें को ढहा दिये की घटना का किसी आतंकवादी घटना या किसी अतिवादी घटना के साथ जोड़ा जाना भी भारतीय समाज को नागँवार गुजरा है.

फरवरी, 2013 – अफजल को फांसी की पाक ने की मुखर निंदा और भारत रहा चुप-

दिल्ली आकर संसद पर हमला करनें वालें और सेकड़ों शीर्षस्थ भारतीय राजनेताओं की सामूहिक ह्त्या का प्रयास करनें वालें अफजल के पाकिस्तान में हुए प्रशिक्षण, भारतीय संसद पर हमलें की योजना में लगे पाकिस्तानी धन, तकनीक और अफजल को दी गई भारतीय उच्चतम न्यायालय की सजा का विरोध और उसकी निंदा आलोचना को आखिर भारतीय प्रधानमन्त्री और विदेश मंत्रालय विश्व समुदाय के समक्ष क्यों नहीं रख पाया यह समझ से परे है. एक भारतीय नागरिक को भारत की ही निर्मलतम उच्चतम न्याय व्यवस्था उसके किये अपराध की सजा देती है और पाक के पेट में बल पडतें हैं तो इससे ही सिद्ध हो जाता है कि वह भारतीय संसद का अपराधी अफजल और कोई नहीं बल्कि पाकिस्तानी में रचे गए षड्यंत्र का एक मोहरा भर था. भारतीय विदेश नीति के पाकिस्तान सम्बंधित अंश के बेतरह विफल होनें का इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता था कि वह अफजल फांसी के मुद्दे पर पाक के खुले भारत विरोध और भारतीय सार्वभौमिकता पर दिन उजालें चोट खानें के बाद भी न तो दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग से स्पष्ट दो टूक बात कर पाया और न ही उसे तलब तक कर पाया था. भारत को चुनौती देनें और अपराध कर आँखें दिखानें का पाकिस्तान का यह मामला यहाँ चरम पर पहुंचा समझा जाना चाहिए था ऐसी भारतीय जनमानस की स्पष्ट सोच थी और जनमानस की यह सोच केन्द्रीय सरकार की नीतियों में प्रतिबिंबित होना चाहिए थी!!! इस बात को स्वर देनें हेतु संसद में सत्ता पक्ष दृड़ प्रतिज्ञ नहीं दिखा और विपक्ष इसके लिए सक्षम नहीं दिखा. समूची संसद ने एकमत होकर एक स्वर में पाक की आलोचना तो की किन्तु इसके आगे कुछ भी ठोस न हो पाया था हमसें?

मार्च, 2013 – हमारें विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने अजमेर में पाक प्र.म. को गर्मजोशी से रोगन-मुर्ग-जोश खिलाया-

भारत-पाक का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तब यह घटना बड़ी ही कड़वाहट से लिखी और पढ़ी जायेगी कि जब पाक सैनिकों ने हमारें दो सैनिकों को मार कर उनके सर काट लिए थे और बेहद क्रूरता और एतिहासिक बर्बरता पूर्वक व्यवहार करते हुए उनके सर कटे शव हमें भेज दिए थे. भारतीय प्रधानमन्त्री और राजनयिकों के आग्रह के बाद भी पाक ने उन सैनिकों के काटें हुए सर न लौटा कर पुरे देश को बेहद शर्म, दुःख और लज्जा कि स्थिति में ला खड़ा किया था उसके ठीक बाद पाकिस्तानी प्रधान मंत्री रजा परवेज अशरफ अपनें पचास सदस्यीय स्टाफ और परिवार के साथ व्यक्तिगत यात्रा पर आये थे. इस समय स्थितियां ऐसी नहीं थी कि उन्हें भारत आना चाहिए था और ऐसी तो बिलकुल भी नहीं थी कि व्यक्तिगत और पारिवारिक यात्रा पर आये रजा परवेज के लिए हमारें विदेश मंत्री उनकी अगवानी को आँखें झुकाएं पलकें फैलाए स्वागत के लिए दिल्ली से दौड़कर जयपुर आकर खड़े हो. जब हमारें विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद नई शेरवानी पहन कर पाक प्र.म. का इस्तकबाल कर रहें थे और उनकें हाथों को चूम रहें थे तब पूरा देश अपनें उन दो शहीदों की अंतिम रस्मों को निभानें और और उनकें परिजनों के आसुंओं को पोछ्नें का असफल प्रयास कर रहा था. आज भी हम यह भी हम नहीं भूलें हैं कि हमारें सैनिकों के कटे सिरों के रक्त से रंजित हाथों से ही पाकिस्तानी नेता के परिवार ने अजमेर में जियारत की थी और हमारें विदेश मंत्री के साथ मुर्ग मुसल्लम भी खाया था. भारतीय सैनिकों की आँखें निकाल लेनें और सर काट कर रखनें और फिर भारत आकर मुर्ग मुसल्लम खानें और फिर अजमेर की दरगाह पर भारतीय सैनिकों के लहू सनें हाथों के निशाँ छोडनें से लेकर भारतीय संसद के हमलावर अफजल की फांसी को गलत ठहरानें तक का घटनाक्रम बहुत तेजी से किन्तु बहुत गहरे घाव करनें वाला हो गया है था तब. भारत की सरजमीं पर बनी दरगाह अजमेर शरीफ की चौखट पर पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री और उनके बेगम की हथेलियों से हमारें सैनिकों की गर्दन से निकलें रक्त के जो निशाँ छुट गए हैं वे हमें बरसो बरस तलक दुखी,व्यथित और उद्वेलित करते रहेंगे. हमारें विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा इन दुश्मनों को दी गई दावत में परोसी गई मुर्ग रोगन जोश में कटे भारतीय मुर्गें भी अपनी नियति को कोसते और इन दुश्मनों के उदर में जानें के हत भाग्य को कोसते ही मरे थे. विडम्बना ही थी कि हमारें देश के मुर्गें दुखी थे कि वे दुश्मनों के पेट में जा रहें थे किन्तु हमारें देश के मंत्री और शासनाध्यक्ष नहीं!!

अप्रेल, 2013 – पाक में रह रहे हिन्दुओं पर अत्याचार, बलात्कार और नृशंस हत्याकांडों के समाचारों पर भारत का चुप रहना-

वैसे तो हम वैश्विक पंचाटों के चौधरी बनें फिरतें हैं किन्तु पाक में रह रहे हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के विषय में हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व और विदेश मंत्रालय चुप ही रहता है. पाक के हिन्दुओं की यह पीड़ा और पाकिस्तान का यह पैशाचिक रूप हम विश्व के मंचों पर नहीं रख पाये फलस्वरूप यह अत्याचार और बर्बरता सतत जारी रहा है. कहना न होगा कि भारतीय विदेश नीति के पाकिस्तान अध्याय को ऐसे लोग लिख और पढ़ रहें हैं जिनकी न मनसा में दम है, न वाचा में शक्ति है और न ही कर्मणा में कुछ कर गुजरनें की चाहत!! अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के अनुमान के अनुसार पाकिस्तान में प्रति माह 20 से 25 हिंदु कन्याओं को जबरन चाक़ू की नोक पर मुसलमान बना दिया जाता है किन्तु हम चुप हैं. यह बात क्यों नहीं कही जा रही कि 1951 में 22% हिंदुओं वालें पाकिस्तान में अब मात्र 1.7% हिंदु ही बच गए है. पाकिस्तान से निरंतर, पीड़ित,प्रताड़ित,परेशान होकर अपनी धन सम्पति छोड़कर पलायन करते हिंदुओं की पीड़ा को हम क्यों अनदेखा कर रहें हैं? हमें विश्व समुदाय को पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों और पाशविक यंत्रणाओं के किस्से भी बतानें होंगें. भारत द्वारा विश्व समुदाय को यह भी बताया जाना चाहिए कि पाकिस्तान में रहनें वालें हिन्दुओं को शान्ति से जीवन जीनें देनें की तो छोडिये उनकें दाह संस्कार में भी अड़ंगे लगाए जातें हैं. विश्व समुदाय के समक्ष पाकिस्तान में होनें वालें हिन्दुओं के “जबरिया धर्मांतरण करो या मर जाओ” के मामलें भी मुखरता से लायें जानें चाहियें थे.

मई 2013 –पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में हमारें सरबजीत सिंह की ह्त्या-

मई में जब पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में वासी चमेल सिंह की ह्त्या भी कोट लखपत जेल में ठीक उसी प्रकार कैदियों से हमला करवा कर की गई थी जैसे सरबजीत सिंह की ह्त्या की गई थी. १५ जन.२०१३ को ह्त्या करने के बाद चमेल सिंह का शव देनें में भी पाकिस्तान द्वारा आना कानी कर समय पास किया गया था.

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vishleshak के द्वारा
August 11, 2013

कलयुग है कलयुग ।विश्लेषक@याहू.इन ।


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