सत्यम्

Just another weblog

169 Posts

51 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12861 postid : 64

“गुलाब भरा आँगन”

Posted On: 15 May, 2013 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

गुलाब भरा आँगन”

सहजता सिमटता हवा का झोंका

सहज होनें का

करता था भरपूर प्रयास.

बांवरा सा

हवा का वह झोंका

गुलाबों भरे आँगन से

चुरा लेता था बहुत सी गंध

और

उसे तान लेता था स्वयं पर.

गुलाब वहां ठिठक जाते थे

हवा के ऐसे

अजब से स्पर्श से

किन्तु हो जाते थे कितनें ही विनम्र

मर्म स्पर्शी

और ह्रदय को छू लेनें को आतुर.

हवा का वह झोंका

आज फिर

यहीं कहीं हैं

गुलाब भरे आँगन के आस पास

गुलाबों की गंध को चुरानें के लिए.

अंतर था तो बस इतना

कि

आज हवा का झोंका

गंध को स्वयं पर तान कर

चला जाना चाहता था दूर कहीं

प्रणव और कल्पनातीत होकर

स्पर्शों के आकर्षण को भूल जाना चाहता था वह.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

3 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sumit के द्वारा
May 18, 2013
vaidya surenderpal के द्वारा
May 18, 2013

सुन्दर भावपूर्ण कविता….


topic of the week



latest from jagran