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"ब्रह्मनाद और स्मृतियाँ"

Posted On: 7 Mar, 2013 Others में

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“ब्रह्मनाद और स्मृतियाँ”

एक शिरा

दो धमनियां

तीन स्पंदन

इन सभी का एक छोटा सा बुलबुला

और

तुम्हारें मेरें प्यार के बड़े होते संसार में

बची कुछ अनुभूतियाँ.

जिजीविषा के साथ जीवन को जी लेती

स्मृतियां

और

इन सभी के सान्निध्य को लिए

कहीं दूर से होते, आते, पुकारतें

आकाश गंगा के जैसे

अनवरत, अक्षुण्ण, अनाकार, अनंत

ब्रह्मनाद.

इन्हें

हम कुछ शब्दों में ही तो बाँध देतें हैं.

कितना सरल होता है

ब्रह्मनाद को भी

कुछ शब्दों निशब्दों में ढाल देना

किन्तु

कितना दरुह और दूभर होता है

प्राणों में

गहरें कहीं धंस गई

स्मृतियों को विस्मृत करना.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

graceluv के द्वारा
March 12, 2013

Hello Dear! My name is Grace, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (gracevaye22@hotmail.com) Greetings Grace

baijnathpandey के द्वारा
March 8, 2013

कितना दरुह और दूभर होता है प्राणों में गहरें कहीं धंस गई स्मृतियों को विस्मृत करना. —————— एक कॉमेंट तो बनता है इस लाजवाब पोस्ट पर | अंतर्मन को अन्दर तक झिन्झोरती शीतल, स्निग्ध रचना | साधुवाद |


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