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नरेन्द्र मोदी के प्रतिरोध के लिए संत शक्ति का अपमान न करें शिवानन्द और जदयू

Posted On: 3 Feb, 2013 Others में

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प्रवीणगुगनानी,47,टैगोर वार्ड,गंज बैतूल.म.प्र.09425002270guni_pra@rediffmail.com

भारत का इतिहास रहा है संत शक्ति से प्रेरणा लेनें का

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चे यानि एन डी ए के घटक के तौर पर जनता दल यूनाइटेड जो कि पिछले दस वर्षों से भाजपा के साथ बिहार में अपना आधार विस्तारित करते हुए आज सत्ता सुख भोग रहा है को अचानक आवश्यक- अनावश्यक, उचित –अनुचित और बिना सोचे व्यक्तव्य जारी करनें की रपत पड़ गई लगती है. हाल ही में जब गुजरात के आम चुनावों में चमकदार हेट ट्रिक जमानें के बाद पुनर्नियुक्त हुए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री पद आसीन होनें की आशाओं के चलते जदयू को जिस प्रकार के अनावश्यक और असमय बुरे बुरे स्वप्न आ रहें हैं और जिस प्रकार जदयू के नेता भयमुक्ति और तनावमुक्ति के लिए मजारों पर जाकर गंडे ताबीज पहननें को उत्सुक और उद्दृत हो रहें हैं उससे लगता है कि वह भी व्यवहारिक और जन आधारित राजनीति की अपेक्षा तुष्टिकरण की कुत्सित और घृणित राजनीति की ओर पींगे बढ़ा रहें हैं.

इन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में जब विश्व हिन्दू परिषद् के वयोवृद्ध नेता व प्रखर चिन्तक अशोक जी सिंघल की ओर से व्यक्तव्य आया कि कुम्भ में एकत्रित संत वृन्द से विमर्श कर व संत समाज की ओर से आगामी प्रधानमन्त्री के नाम की घोषणा की जायेगी तब जदयू के प्रवक्ता शिवानन्द तिवारी ने धृष्टता पूर्वक कह दिया कि “अब यदि साधू संत प्रधानमन्त्री तय करेंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा.” ऐसा कहते समय जदयू के अधिकृत प्रवक्ता को ध्यान रखना चाहिए था कि हमारें भारतीय समाज और इस भारतभूमि के शासकों को संत शक्ति की मंत्रणा और परामर्श से शासन चलातें हुए करोड़ो वर्ष हो गएँ हैं. भारतीय इतिहास इस बात का प्रामाणिक और सशक्त साक्ष्य है कि हमारें शासक और राजा महाराजा जब जब संत और साधू शक्ति से प्रभावित रहें है केवल तब तब ही भारत विश्व का सर मौर बना और सोनें की चिड़िया कहला कर सम्पूर्ण विश्व में मार्गदर्शक बना. शिवानन्द तिवारी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस ब्रह्म भूमि बिहार में वे जन्में और पले बढ़ें हैं उसी बिहार की भूमि पर जन्में और सम्पूर्ण विश्व के राष्ट्राध्यक्षों और सभ्यताओं को अर्थ शास्त्र के प्रणेता कौटिल्य यानि कि चाणक्य संत ही थे. जदयू के प्रवक्ता शिवानन्द तिवारी को कम से कम एक बिहारी होनें के नाते इस बात का गौरव भान होना चाहिए व यह भी स्मरण रखना चाहिए कि वे जिस संत शक्ति को हिकारत भरी दृष्टि से देख रहें हैं वह संत शक्ति बिहार के भोजपुरिया अंचल में संत कबीर के रूप में जन्म लेकर पुरे देश के शासनाध्यक्षों को नीति रीति का पाठ पढ़ा चुकी है. क्या बिहार में जन्में शिवानन्द सम्पूर्ण विश्व के राजाओं, महाराजाओं को सुशासन और नीति सुनीति का पाठ सिखानें वालें बिहार में ही जन्में महान दिग्दर्शक भगवान बुद्ध को भी भूल गएँ हैं? जदयू प्रवक्ता शिवानन्द की ही कर्मभूमि बिहार में जन्में एक और संत शक्ति के प्रतीक गुरु गोविन्द सिंग की प्रेरणास्पद, अद्भुत और चमत्कृत कर देनें वाली राजनीति को कैसे विस्मृत कर सकतें हैं?? बिहार में जन्में गुरु गोविन्द सिंग की संत शक्ति ने उस समय राजनीति नहीं की होती तो संभवतः न शिवानन्द जैसे सैकड़ो भारतीयों के सिर कटनें से बचे होते न हम !!! गठबंधन की राजनीति में उनकें आका नीतिश की महत्वकांक्षा गणित को बिगड़ता देख शिवानन्द और स्वयं नीतिश उल जुलूल व्यक्तव्य देकर कभी संत शक्ति को कोसतें हैं तो कभी यह कहकर देश के एक सौ दस करोड़ हिन्दुओं का अपमान करतें हैं कि “कोई हिंदूवादी इस देश का प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता” उन्हें कम से कम उनकी जन्मभूमि बिहार में ही जन्में संत शक्ति के उज्जवल प्रतीक और शिरोमणि विश्व पथ प्रदर्शक भगवान महावीर को अवश्य स्मृत रखना चाहिए था. बिहार में ही जन्में संत भगवान महावीर ने जिस प्रकार अनेकों राजाओं, महाराजाओं और सम्राटों की राजनीति को जनोन्मुखी, कल्याणोंन्मुखी और देशोंन्मुखी बनाया वैसा उदाहरण विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं मिलता है.

जदयू के अतिमहत्वाकांक्षी नीतिश और उनकें सारथी शिवानन्द को ध्यान रखना चाहिए कि बिहारी अस्मिता हमेशा राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ी रहीहै. हजार बरसों तक पाटलिपुत्र संत शक्ति के कारण ही देश की सांस्कृतिक राजधानी रहा और संतो के प्रभाव से ही पाटलिपुत्र का इतिहास ही देश का इतिहास बन गया!!! भगवान महावीर, भगवान बुद्ध,चाणक्य,अजातशत्रु, अशोक महान, दार्शनिक अश्वघोष, रसायन शास्त्र के जनक नागार्जुन, चिकित्सक जीवक और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट जैसे महापुरुष इस धरती पर हुए, जो संत ही थे जो निस्स्संदेह प्रयाग इलाहबाद में हो रहें कुम्भ में एकत्रित साधुओं के साथ साथ हमारें ही पूज्य पूर्वज थे और जिनसे भारत को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली; इस परंपरा पर कौन गर्व नहीं करता? मुझे खेद है कि मैं यहाँ सम्पूर्ण देश की तो छोडिये केवल नीतिश के बिहार के भी सभी राजनीति को प्रभावित करनें वालें संतो का नाम स्मरण कर नहीं लिख पा रहा हूँ किन्तु मुझे इस संत शक्ति और उसकी राजनैतिक प्रेरणा के इतिहास और संभावित भविष्य पर गर्व व अभिमान है किन्तु लगता है नीतिश और शिवानन्द को इस सब पर गौरव नहीं है.

गठबंधन की राजनीति को पाठ पढानें के नाम पर नित नई चुनौती देते जदयू के नेताओं और अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी नेताओं को नरेन्द्र मोदी के नाम से परहेज करनें के स्थान पर उनका समुचित आकलन करना चाहिए. भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी यह तथ्य समझ लेना चाहिए की देश के मतदाताओं की मनोस्थिति नरेंद्र मोदी के नाम पर एक मत होती दिख रही है. मोदी ने गुजरात में विकास और प्रगति के नए आयाम गढ़कर कर जिस प्रकार कांग्रेस और उनकी अपनी भाजपा में ही उनकें विरोधियों को जिस प्रकार जन स्वीकार्यता के माध्यम से चुप्पी की अँधेरी सुरंग में धकेल दिया है वह सराहनीय है. ऐसा लगनें के पर्याप्त और एकाधिक कारण है कि नरेन्द्र मोदी की अगुआई में चुनाव लड़नें की स्थिति में भाजपा सीटों के जादुई आकड़े को पार कर नई राजनीति का सूत्रपात कर सकती है. देश में प्रधानमन्त्री के लिए जिस प्रकार उनकें नाम को स्वीकारा जा रहा है उससे लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में यदि वे प्रधानमन्त्री के घोषित उम्मीदवार के तौर पर सामनें होतें हैं तो मतदाता सांसद के प्रत्याशी की योग्यता के आधार पर नहीं वरन केवल नरेन्द्र मोदी के मोर्चे या दल का सांसद होनें के कारण वोट देगा. आगामी लोकसभा चुनाव सांसदों के नाम पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर लड़ा जाएगा और यह देश का पहला अवसर होगा जब देश वासी सांसद नहीं बल्कि सीधे प्रधानमन्त्री बनानें की लालसा से मतदान करेंगे.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

baijnathpandey के द्वारा
February 4, 2013

आदरणीय प्रवीण जी, नमस्कार बात हिन्दू विचारधारा की नहीं बल्कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति एवं अपना उम्मीदवार स्वयं चुनने के अधिकार का है . यदि बड़े से बड़े घोटालेबाज नेता अथवा भ्रष्ट से भ्रष्ट पब्लिक फिगर अपनी और से किसी को प्रधानमन्त्री पद का सच्चा दावेदार मान सकते हैं तो संत समाज क्यूँ नहीं . क्या उनके विरुद्ध बिना वजह प्रलाप करना कानून के अनुसार अपराध नहीं है ? क्या उनको अपना मत प्रगट करने से रोकना मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है ? लानत है ऐसी सोंच पर जो एक व्यक्ति के नागरिक अधिकारों पर भी पाबंदी लगाने के लिए उद्धत है . गणतंत्र में जितना अधिकार शिवानंद जी को मिली है उतना संत समाज को भी . संत समाज ने तो अनेक बार भारतवर्ष को सही राह दिखाया है किन्तु इन्होने ने तो ब्राह्मणत्व को बारम्बार लज्जित किया है और यह सिद्ध किया है कि विदेशी आक्रमणकारियों के प्रभाव से जो जन्म के अनुसार जातिगत ढांचा बना है वो समाज के लिए कितना घातक है . ब्राह्मण केवल वही हो सकता है जो सामाजिक हित में अपना बलिदान कर दे न कि वो जो समाज को गलत दिशा दिखाकर उसे दिग्भ्रमित करे . अच्छे पोस्ट के लिए बधाई .

ashokkumardubey के द्वारा
February 4, 2013

आज देश की राजनितिक दलों में केवल प्रधानमंत्री कौन बने? इसी बात की चर्चा का होना कतई जनहित और देश हित में नहीं क्यूंकि इन चर्चाओं का देश की राजनीती एवं देश के नेताओं पर कोई असर नहीं डालता यह महज चर्चा परिचर्चा का विषय बनकर रह जाता है क्यूंकि आज जो नेता चाहे वह सत्ता पर काबिज हो या विपक्ष में झुठमुठ का बयान देता है कुछ करता दिखाई दे रहा हो ऐसा नहीं है ,उसको जनता से कोई सरोकार नहीं चाहे जनता अल्पसंख्यक समुदाय की हो या बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय से हो इन नेताओं को आज जनता से कोई सरोकार नहीं और आज जिस तरह से इस देश की जनता महंगाई ,भ्रष्टाचार ,न्याय मिलने में देरी ,पुलिस का ब्यवहार और न जाने कितनी बुनियादी सुविधाएँ ,जरूरतें ऐसी जन समस्यायों सेजूझ रही है उन समस्यायों से लोगों का ध्यान हटाने के सिवा और कोई काम ये नेता करते नहीं दिखाई देते जैसे चुनाव का वख्त नजदीक आता है सत्ता पक्ष तरह तरह की जन कल्याण की योजनाओं की घोषणा कारन शुरू कर देती है बेशक चुनाव आयोग जितना मर्जी इन पर चुनाव आचार सहिता के उल्लघन का आरोप लगाता रहे ये नेता वही करते हैं जो इनके मन को भाता है क्यूंकि चुनाव आयोग भी इनका, न्यायायलय भी इनका, पुलिस भी इनकी, सी बी आई भी इनकी. फिर ऐसे में जिस जनतंत्र की दुहाई ये नेता दे रहें हैं आपको क्या लगता है? क्या? नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन जायेंगे तो सी बी आई को स्वतन्त्र कर देंगे एक मजबूत जनलोकपाल बिल लागु कर देंगे क्या कानून का राज स्थापित हो जायेगा क्या गुंडे इस देश में मंत्री पद पर नहीं रहंगे सांसद नहीं बनेंगे आपके विचार इस पर भी मैं जानना चाहूँगा वैसे श्री शिवानन्द तिवारी के विषय में आपने जितना कुछ लिखा है उससे कहीं ज्यादा मैं आपको उनके बारे में बता सकता हूँ क्यूंकि मुझे कभी उनके बहुत करीब रहने का अवसर मिला है और मैं बिहार का ही रहने वाला हूँ आज से चंद साल पहले वे महान नेता श्री लालू प्रसाद यादव जी के चरण कमलों में मथ्था टेकते नजर आये थे और आज बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार की चरण वंदना कर रहें हैं और उसी चाटुकारिता के तहत संतों की वाणी का इस तरह अनादर कर रहें हैं दुर्भाग्य से वे भी ब्राह्मण परिवार के सदस्य हैं और इनके पिताश्री दिवंगत रामानानद तिवारी एक जुझारू और इमानदार नेता थे शिवानन्द भाई में ऐसा कोई गुण नहीं अतः मैं उनके बयान के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखूंगा केवल इतना जरुर कहूँगा जिस नितीश कुमार ने उनको राजसभा में भेजा है भला उनकी चाटुकारिता करनेमें उनको खुश रखने में ये कैसे पीछे हटते और नितीश भी तो प्रधानमंत्री बनने के लिए आतुर हैं हालाँकि उनको अच्छी तरह पता है वे बिहार में बीजेपी के समर्थन से हीं सरकार चला रहें हैं लेकिन बीजेपी को सांप्रदायिक कहने का कोई मौका ये हाथ से जाने देना नहीं चाहते. इस देश में काबिज कांग्रेस की सरकार जो आज सत्ता में है जो मुस्लिम अपराधी को भी फांसी नहीं देने की वकालत करती है उसको हीं इस देश में सेकुलर कहा जाता है बाकि सभी सांप्रदायिक हैं यह कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों का देश की जनता को बांटे रखने की साजिश है हालाँकि इनमे से कोई भी पार्टी अल्पसंख्यक समुदाय का कुछ भला करने वाली नहीं पर उनका वोट पाने के लिए ऐसे तिकड़म का इस्तेमाल जरुर करते हैं और इस देश के बहुसंख्यक हिन्दू पूरी संख्या में वोट देने जाते ही नहीं हैं क्यूंकि वे तो रामायण की चौपाई को याद करते हैं जिसमे बहुत वर्ष पहले लिखा गया है “कोउ नृप होहिं हमें का हानि चेरी छाडी होयिबो ना रानी ” अतः प्रधानमंत्री कोई बने यहाँ राज काज हमेशा से पूंजीपतियों के हाथ रहता है और रहेगा एक बामपंथी पूंजीपतियों का विरोध करते थे अब वे भी मलाई खाने लगे हैं क्यूंकि चुनाव जीतने के लिए पैसा चाहिए और पैसा इनको पूँजी पति हीं उपलब्ध करते रहें हैं अतः किसी बदलाव की सोचना मूर्खता होगी चाहे पी एम् मोदी बने या और कोई हाँ उनके पीएम बनने से सेकुलर की परिभाषा जरुर बदलेगी


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