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अपलक देखतें सपनें

Posted On: 6 Oct, 2012 Others में

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अपलक देखतें सपनें

आँखों में था

पूरा ही आकाश

तब भी और अब भी

और थे उसमें से झाँकतें निहारतें

कृतज्ञता के ढेरों सितारें.

और थे उसमें आशाओं के कितने ही कबूतर

जिन्हें उड़ना होता था बहुत

और नीचें धरती पर होता था

सेकडों मील मरुस्थल

और आशाओं निराशाओं के फलते फलियाते

फैलते दावानल.

सम्बन्धों की दूरियों के बीच

कितने ही तो बिम्ब प्रतिबिम्ब थे

और कितनें ही प्रतीक और उदाहरण

किस किस पर छिड़क दें प्राण

और किस किस के ले लें प्राण?

ये कैसी है उड़ान

कि बहुत सी सुनी अनसुनी बातों को

उठाये अपनी पलकों पर

इस तरह

कि वे पलक झपकते ही गिर जाएँ

या हो जाएँ अपलक ही कोई स्वप्न पूरा.

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
October 10, 2012

प्रवीण जी, सुन्दर भावों को प्रकट करती एक आम आदमी के सपनो से सम्बंधित आपकी कविता सराहनीय है!

yogi sarswat के द्वारा
October 10, 2012

सम्बन्धों की दूरियों के बीच कितने ही तो बिम्ब प्रतिबिम्ब थे और कितनें ही प्रतीक और उदाहरण किस किस पर छिड़क दें प्राण और किस किस के ले लें प्राण? ये कैसी है उड़ान स्वागत है आपका ! सुन्दर शब्द

    praveengugnani के द्वारा
    October 13, 2012

    धन्यवाद ..आभार…

Santosh Kumar के द्वारा
October 9, 2012

आदरणीय प्रवीण जी ,..सादर अभिवादन बहुत सुन्दर रचना ,.. आँखों में था पूरा ही आकाश तब भी और अब भी और थे उसमें से झाँकतें निहारतें कृतज्ञता के ढेरों सितारें….हार्दिक आभार आपका ..सादर

    praveengugnani के द्वारा
    October 13, 2012

    धन्यवाद.. आभार…

shalinikaushik के द्वारा
October 6, 2012

ये कैसी है उड़ान कि बहुत सी सुनी अनसुनी बातों को उठाये अपनी पलकों पर इस तरह कि वे पलक झपकते ही गिर जाएँ या हो जाएँ अपलक ही कोई स्वप्न पूरा. बहुत सुन्दर भावों को शब्दों की माला में पिरोया है aapne.

    praveengugnani के द्वारा
    October 13, 2012

    घन्यवाद आभार..


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